मणिशंकर अय्यर की अध्यक्षता वाली उस समिति ने, जो क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों की समीक्षा के लिए बनी थी, अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। इस तीन सदस्यीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में एक दिलचस्प सुझाव दिया है जिसका न सिर्फ स्वागत किया जाना चाहिए बल्कि उसे तत्काल अमल में भी लाया जाना चाहिए। यह सुझाव है साहित्य अकादमी, ललित कला अकादमी और संगीत नाटक अकादमी की तर्ज पर एक नई लोक और जनजातीय कला अकादमी बनाने का। हालांकि ऐसा नहीं था कि अब तक लोक और जनजातीय कलाओं को केंद्रीय स्तर पर प्रोत्साहन और संरक्षण नहीं मिलता था। यह काम अब तक संगीत नाटक अकादमी के माध्यम से होता था। जाहिर है इस सिफारिश को अगर अमल में लाया जाता है तो संगीत नाटक अकादमी के दायरे से यह काम बाहर हो जाएगा। इससे अकादमी का भार भी हल्का होगा और वह शास्त्रीय कलाओं पर ज्यादा ध्यान देगी। हालांकि देखना यह है कि सरकार इस समिति की अनुशंसाओं पर ध्यान देती भी है या नहीं। इन्हीं क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों की समीक्षा के लिए पहले बनी अनंतमूर्ति समिति की रपट पांच साल तक धूल फांकती रही। पांच साल के बाद उसकी सिर्फ एक या दो अनुशंसाओं पर ही अमल हुआ। इस रूप में अय्यर समिति का परिणाम देखना बाकी है। बहरहाल, यह एक अलग मसला है। मुद्दे की बात यह है कि लोक और जनजातीय कलाओं के लिए नई अकादमी बनाने की अनुशंसाएं की गई हैं। यह अलग से रेखांकित करने की जरूरत नहीं कि यह जरूरी भी है। दरअसल, भारतीय कला परिदृश्य इतना वैविध्यपूर्ण है कि उसे संजोने और विकसित करने का काम किसी एक संस्थान के बूते की बात नहीं है। भारत में विविध शास्त्रीय कला परम्पराएं हैं लेकिन शास्त्रीय से भी ज्यादा लोक और जनजातीय कला परम्पराएं हैं। इनमें कई तो विलुप्त होने की कगार पर हैं। उन्हें न सिर्फ बचाया जाना चाहिए बल्कि उनका नवीनीकरण भी किया जाना चाहिए। इस सबके लिए पर्याप्त सुविधाएं और संसाधन चाहिए। इसके अलावा लोक कलाकारों के भीतर एक आत्मविश्वास पैदा करने की जरूरत भी है कि वे अपनी परम्परा और धरोहर को जीवित रखें। अगर नई अकादमी बनती है तो इस दिशा में कुछ उल्लेखनीय काम हो सकता है। लोक कलाकारों के आर्थिक पक्षों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए लेकिन मसला सिर्फ लोक और जनजातीय कलाओं के संरक्षण और संवर्धन का ही नहीं है। मसला तो लोककलाओं और शास्त्रीय कलाओं के बीच उस विभाजन तो रोकने का भी है जिसके कारण कलाओं की एक वर्ण व्यवस्था बन गई है और इसके तहत शास्त्रीय कही और मानी जानेवाली कलाएं उच्चतर मानी जाती हैं और लोक व आदिवासी कलाएं कुछ कमतर। यह दीगर बात है कि शास्त्रीय नृत्य और संगीत बेहद कठोर अभ्यास और अनुशासन से परिष्कृत होता है और उनमें निपुणता के लिए लम्बा वक्त और पूर्ण समर्पण चाहिए। इसके बरक्स यह माना जाता है कि लोक कलाकारों को उतने लम्बे अभ्यास की जरूरत नहीं होती लेकिन यही अपने में एक गलत अवधारणा है जिसके फैलने में उन सरकारी कार्यक्रमों की भी भूमिका है जो अक्सर किसी औपचारिक मौके पर अफरा-तफरी में कराए जाते हैं लेकिन हकीकत यह है कि बेहतर लोक कलाकार बनने के लिए भी जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसलिए नई समझ की भी आवश्यकता है। नई अकादमी, अगर बनती है तो उसके सामने यह चुनौती होगी कि लोक कलाकारों के प्रशिक्षण और नवीनीकरण के लिए काम करे। आजादी के बाद हमारी लोककलाएं सिर्फ प्रदर्शन की वस्तु बन गई। उन पर किसी तरह का बौद्धिक विमर्श नहीं हुआ। यानी नई अकादमी किसी तरह की अकादमिक जड़ता की शिकार न हो जाए जैसा कि कई राज्य अकादमियां हो चुकी हैं। नई अकादमी भारत में लोककलाओं और जनजातीय कलाओं में पुनर्जागरण पैदा कर सकती है लेकिन ऐसा करने के लिए उसे एक खुला और रचनात्मक दृष्टिकोण अपनाना होगा। बहरहाल पहले तो ये देखना है कि सरकार कितनी जल्दी इस दिशा में आगे बढ़ती है।
Monday, April 18, 2011
लोक-जनजाति कला अकादमी स्वतंत्र बने
मणिशंकर अय्यर की अध्यक्षता वाली उस समिति ने, जो क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों की समीक्षा के लिए बनी थी, अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। इस तीन सदस्यीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में एक दिलचस्प सुझाव दिया है जिसका न सिर्फ स्वागत किया जाना चाहिए बल्कि उसे तत्काल अमल में भी लाया जाना चाहिए। यह सुझाव है साहित्य अकादमी, ललित कला अकादमी और संगीत नाटक अकादमी की तर्ज पर एक नई लोक और जनजातीय कला अकादमी बनाने का। हालांकि ऐसा नहीं था कि अब तक लोक और जनजातीय कलाओं को केंद्रीय स्तर पर प्रोत्साहन और संरक्षण नहीं मिलता था। यह काम अब तक संगीत नाटक अकादमी के माध्यम से होता था। जाहिर है इस सिफारिश को अगर अमल में लाया जाता है तो संगीत नाटक अकादमी के दायरे से यह काम बाहर हो जाएगा। इससे अकादमी का भार भी हल्का होगा और वह शास्त्रीय कलाओं पर ज्यादा ध्यान देगी। हालांकि देखना यह है कि सरकार इस समिति की अनुशंसाओं पर ध्यान देती भी है या नहीं। इन्हीं क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों की समीक्षा के लिए पहले बनी अनंतमूर्ति समिति की रपट पांच साल तक धूल फांकती रही। पांच साल के बाद उसकी सिर्फ एक या दो अनुशंसाओं पर ही अमल हुआ। इस रूप में अय्यर समिति का परिणाम देखना बाकी है। बहरहाल, यह एक अलग मसला है। मुद्दे की बात यह है कि लोक और जनजातीय कलाओं के लिए नई अकादमी बनाने की अनुशंसाएं की गई हैं। यह अलग से रेखांकित करने की जरूरत नहीं कि यह जरूरी भी है। दरअसल, भारतीय कला परिदृश्य इतना वैविध्यपूर्ण है कि उसे संजोने और विकसित करने का काम किसी एक संस्थान के बूते की बात नहीं है। भारत में विविध शास्त्रीय कला परम्पराएं हैं लेकिन शास्त्रीय से भी ज्यादा लोक और जनजातीय कला परम्पराएं हैं। इनमें कई तो विलुप्त होने की कगार पर हैं। उन्हें न सिर्फ बचाया जाना चाहिए बल्कि उनका नवीनीकरण भी किया जाना चाहिए। इस सबके लिए पर्याप्त सुविधाएं और संसाधन चाहिए। इसके अलावा लोक कलाकारों के भीतर एक आत्मविश्वास पैदा करने की जरूरत भी है कि वे अपनी परम्परा और धरोहर को जीवित रखें। अगर नई अकादमी बनती है तो इस दिशा में कुछ उल्लेखनीय काम हो सकता है। लोक कलाकारों के आर्थिक पक्षों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए लेकिन मसला सिर्फ लोक और जनजातीय कलाओं के संरक्षण और संवर्धन का ही नहीं है। मसला तो लोककलाओं और शास्त्रीय कलाओं के बीच उस विभाजन तो रोकने का भी है जिसके कारण कलाओं की एक वर्ण व्यवस्था बन गई है और इसके तहत शास्त्रीय कही और मानी जानेवाली कलाएं उच्चतर मानी जाती हैं और लोक व आदिवासी कलाएं कुछ कमतर। यह दीगर बात है कि शास्त्रीय नृत्य और संगीत बेहद कठोर अभ्यास और अनुशासन से परिष्कृत होता है और उनमें निपुणता के लिए लम्बा वक्त और पूर्ण समर्पण चाहिए। इसके बरक्स यह माना जाता है कि लोक कलाकारों को उतने लम्बे अभ्यास की जरूरत नहीं होती लेकिन यही अपने में एक गलत अवधारणा है जिसके फैलने में उन सरकारी कार्यक्रमों की भी भूमिका है जो अक्सर किसी औपचारिक मौके पर अफरा-तफरी में कराए जाते हैं लेकिन हकीकत यह है कि बेहतर लोक कलाकार बनने के लिए भी जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसलिए नई समझ की भी आवश्यकता है। नई अकादमी, अगर बनती है तो उसके सामने यह चुनौती होगी कि लोक कलाकारों के प्रशिक्षण और नवीनीकरण के लिए काम करे। आजादी के बाद हमारी लोककलाएं सिर्फ प्रदर्शन की वस्तु बन गई। उन पर किसी तरह का बौद्धिक विमर्श नहीं हुआ। यानी नई अकादमी किसी तरह की अकादमिक जड़ता की शिकार न हो जाए जैसा कि कई राज्य अकादमियां हो चुकी हैं। नई अकादमी भारत में लोककलाओं और जनजातीय कलाओं में पुनर्जागरण पैदा कर सकती है लेकिन ऐसा करने के लिए उसे एक खुला और रचनात्मक दृष्टिकोण अपनाना होगा। बहरहाल पहले तो ये देखना है कि सरकार कितनी जल्दी इस दिशा में आगे बढ़ती है।
Sunday, April 10, 2011
बहियों में है देश के हर कोने का हिसाब
यदि आप अपना नाम बताएं और सामने बैठा पंडा-पुरोहित आपकी कई पीढि़यों के नाम बता दे तो आपको अचरज अवश्य होगा। जी हां, बद्रीनाथ धाम पहुंचने वाले श्रद्धालु चाहें तो अपने पुरखों की जानकारी पलक झपकते ही हासिल कर सकते हैं। दरअसल बद्रीनाथ के पंडे बहियों मे यहां आने वाले यात्रियों का रिकार्ड रखते आ रहे हैं और यह लेखा किसी अनमोल धरोहर से कम नहीं है। बद्रीनाथ में आने वाले तीर्थयात्रियों की पूजा-पाठ का दायित्व देवप्रयाग (टिहरी गढ़वाल) का पुरोहित समाज संभालता है। इनकी बहियों में राजा रजवाड़ों से लेकर स्वतंत्र भारत का इतिहास सिमटा हुआ है। सत्रहवीं शताब्दी से बहियों का प्रचलन सामने आया था। इससे पहले भोजपत्रों, ताम्रपत्रों का चलन था। देवप्रयाग नगर सहित 42 गांव के पुरोहितों की बहियों में भारत के चप्पे-चप्पे की जानकारी समाई हुई है। बदरीनाथ यात्रा पर आए तीर्थयात्रियों का नाम जाति, गोत्र, वंश, जिला, गांव, मोहल्ला सबकी जानकारी इनमें है। पुरोहितों के उपनाम भी उनके क्षेत्रानुसार यहां प्रचलन में है दिल्ली क्षेत्र का तीर्थ पुरोहित दिल्लीवाल, उसी तरह मेरठवाल, सागरवाल, प्रयागवाल, करोलीवाल, रीवांवाल आदि कहे जाते हैं। श्री बदरीपंडा पंचायत के तहत तीर्थ पुरोहितों के आठ थोकों की व्यवस्था बनी हुई है। पंडा पंचायत अध्यक्ष मुकेश भट्ट प्रयागवाल तीर्थ पुरोहितों की बहियों को महत्वपूर्ण सनद मानते हैं। उनके अनुसार देश के कई परिवारों का बंटवारों और फैसलों में कोर्ट भी इन्हें मान्य करता आया है। कई बहियां तो एक किलोमीटर लंबाई और 70 किलो वजन तक की भी हैं। पहले ये हरिद्वार से बद्रीनाथ लाई जाती थीं। बाद में इन बहियों को हरिद्वार, देवप्रयाग और बद्रीनाथ में रखा जाने लगा। काफी परिश्रम से बनी इन बहियों में भारत के प्रसिद्ध संतों राजनेताओं कलाकारों समाज सेवियों उद्योगपतियों आदि की वंशावलियां, उनके हस्ताक्षर सहित मौजूद हैं|
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