Monday, March 7, 2011

ठहरे हुए सांस्कृतिक केंद्र


राजीव गांधी के कार्यकाल में पूरे देश में सात क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों की स्थापना इस मकसद से की गई थी कि वे अपने-अपने इलाके की सांस्कृतिक विविधता और सृजनात्मकता के लिए माहौल बनाएंगे और उन्हें नए अवसर देंगें लेकिन जल्द ही ये संस्थाएं नौकरशाही के ढांचे में ऐसी ढलीं कि मकसद से ही भटक गई
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों (जोनल कल्चरल सेंटर) की समीक्षा के लिए मणिशंकर अय्यर की अध्यक्षता में जो तीन सदस्यीय समिति गठित की थी, उसकी रिपोर्ट अगले हफ्ते आ सकती है। अय्यर के अलावा भारत सरकार के पूर्व सांस्कृतिक सचिव सीताकांत महापात्र और अभिनेता- सह निर्देशक अमोल पालेकर इसके अन्य सदस्य हैं। ऐसे वक्त में जब देश की अन्य सांस्कृतिक संस्थाएं अपने मकसद से दूर होती गई हैं, तब सिर्फ क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों पर र्चचा करना शायद बहुत प्रासंगिक नहीं होगा। लेकिन चूंकि इनकी समीक्षा के लिए बनी समिति की रिपोर्ट आनेवाली है तो इस मसले पर चुप्पी एक सांस्कृतिक अनदेखी भी होगी। राजीव गांधी के कार्यकाल में पूरे देश में सात क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों की स्थापना इस मकसद से की गई थी कि वे अपने अपने इलाके की सांस्कृतिक विविधता और सृजनात्मकता के लिए माहौल बनाएंगें और उन्हें नए अवसर देंगें लेकिन जल्द ही ये संस्थाएं नौकरशाही के ढांचे में ऐसी ढलीं कि मकसद से ही भटक गई। ऐसा नहीं है कि ये निष्क्रिय रहीं। इनमें काफी सक्रियता रही और इनके आयोजनों में लोगों की भागादारी भी रहती है। लेकिन सिर्फ कार्यक्रमों का आयोजन ही काफी नहीं होता। वास्तविकता यह है कि सांस्कृतिक सृजनशीलता से जुड़े लोगों का इन सांस्कृतिक केंद्रों से तादात्म्य नहीं बन सका। ये क्षेत्रीय केंद्र मौटे तौर पर भारत सरकार के संगीत और नृत्य प्रभाग की तरह हो गए हैं जो यदा-कदा लोगों के लिए सिर्फ सांस्कृतिक शामें आयोजित करते हैं। इन केंद्रों का मुख्य जोर लोककला और लोकसंगीत पर रहा। पर वहां भी परिप्रेक्ष्य छोटा ही रहा। यह ठीक है कि भारत जैसे बड़े देश में लोककला- लोकसंगीत की अपनी अहिमयत है और वह धीरे-धीरे लगातार संकटग्रस्त होता जा रहा है किंतु लोककला कोई ठहरी हुई चीज नहीं है। वह भी निरंतर विकसित होनेवाली चीज है। भारत भवन में जगदीश स्वामीनाथन ने आदिवासी लोककलाओं को आधुनिकता के साथ जोड़ा था। इसी के फलस्वरूप जनगण सिंह श्याम और दूसरे कई आदिवासी कलाकारों ने आधुनिक चित्रकला में भी अपनी जगह बनाई। पर इन क्षेत्रीय केंद्रों ने आधुनिक चित्रकला और मूर्तिकला को पारंपरिक लोककलाओं के साथ जोड़ने की सघन कोशिश नहीं की। लोककलाएं भी नवीनता ग्रहण करती रहती हैं, इसका ध्यान नहीं रखा गया। भारत भवन का ही दूसरा उदाहरण लें तो बव कारंत ने बुंदेली में ब्रेख्त के नाटक किए जो अपने में काफी सफल प्रयोग था और आधुनिक भी। हमारे क्षेत्रीय केंद्र भी चाहते तो इस तरह के प्रयोग आधुनिक रंगकर्मिंयों के साथ मिलकर कर सकते थे। क्या यह जरूरी है कि जब भोजपुरी के कार्यक्रम हों तो वहां सिर्फ लोकगायन ही हो। फिर लोकभाषाओं में नई सृजनात्मकता कैसे पैदा होगी। हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ी में नाटक करने का जो सिलसिला शुरू किया, वह अपने में नई दिशा बन गई। हमारे क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र भी इस दिशा में आगे बढ़ते हुए नए अन्वेषण कर सकते थे। लेकिन इस दिशा में तो झांका भी नहीं गया। यह भी गौर करना जरूरी है कि जिस समय सांस्कृतिक केंद्रों की स्थापना हुई थी, उस समय फिल्म निर्माण की टेक्नोलॉजी काफी महंगी थी। लेकिन अब वो अपेक्षाकृत सस्ती हो गई है और सुलभ भी। हमारे सांस्कृतिक केंद्र इस दिशा में भी अपनी राहें बना सकते हैं। समीक्षा समिति में फिल्मकार अमोल पालेकर भी हैं। पता नहीं, उनका ध्यान इस तरफ जाता है या नहीं। लेकिन फिल्म को लेकर समाज की आकांक्षाओं को हमारे सांस्कृतिक केंद्र महसूस नहीं कर पाते। इसके अलावा बाल रंगमंच का सवाल है जिस पर हमारे सांस्कृतिक केंद्रों ने लगभग नहीं के बराबर ध्यान दिया है। पता नहीं समिति ने इसका खयाल रखा है या नहीं। बहरहाल, समिति की रिपोर्ट को लेकर समाज और सांस्कृतिक हलकों में व्यापक र्चचा होनी चाहिए। सातों सांस्कृतिक केंद्र ठहराव की स्थिति में हैं। उनकी सोच में बदलाव की जरूरत है।


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