Saturday, March 12, 2011

रंग डाला तो करनी पड़ेगी शादी


 रंग डाला तो करनी पड़ेगी शादी। जी हां, कुछ ऐसी ही है झारखंड के पूर्वी सिंहभूम में बसे आदिवासी समुदाय की परंपरा। संथाल जाति (आदिवासी) में यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। यही कारण है कि होली के दौरान भी आदिवासी समुदाय रंगों से परहेज करता है। समुदाय में होली तो खेली जाती है लेकिन पानी से। अगर किसी युवक ने किसी युवती को रंग डाला तो माझी परगना (आदिवासी स्वशासन) व्यवस्था इसे गंभीर अपराध मानती है, क्योंकि रंग डालने को समुदाय में सिंदूरदान (विवाह की रस्म) के बराबर माना जाता है। रंग कोई भी हो, युवक ने युवती को अथवा युवती ने युवक को रंग डाला तो इसे जबरन विवाह माना जाता है, और एक बार रंग डालने के बाद इसे सामाजिक अपराध मानते हुए इस पर पंचों की बैठक बुलाई जाती है। अगर युवक-युवती शादी को तैयार हुए तो बाकी की रवायत मझी मोड़े (पंचों की राय) से पूरी कर दी जाती है, हालांकि अधिकांश समय रंग डालने वाले युवक पर डांडोंम (जुर्माना) ठोंक दिया जाता है। संथाल जाति की परंपराओं पर शोध कर रहे रांची विश्वविद्यालय के छात्र भुगलू सोरेन कहते हैं-आदिवासी समुदाय में महिलाओं को रंग डालना पूरी तरह मना है, लेकिन पुरानी परंपरा यह रही है कि जिस युवक-युवती में प्रेम होता है और उनके परिवार उनके विवाह की अनुमति नहीं देते वे अक्सर शादी करने के लिए यही रास्ता अपनाते हैं। लड़का या तो लड़की को जबरन सिंदूर डाल देता है, या फिर होली या किसी दूसरे अवसरों पर रंग डाल देता है। श्यामा प्रसाद मेमोरियल कॉलेज के ओलचिकि (संथाली लिपि के शिक्षक) लखाई बास्के बताते हैं कि किसी युवक ने अगर लड़की पर गलती से भी रंग डाला तो उसे आदिवासी परंपरा के मुताबिक विधिवत तलाक लेना पड़ता है। ऐसी घटनाओं में पहले पंच बैठते हैं, महिला की शिकायत सुनते हैं और जबरन रंग डालने की स्थिति में पहले तो युवक पर 2000 रुपए से 20 हजार रुपए तक का जुर्माना लगाते हैं, इसके बाद विधिवित तलाक की घोषणा करते हैं। तलाक तो हो जाता है लेकिन इस घटना के बाद उस युवती को छडूय यानी तलाकशुदा माना जाता है|

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