Monday, April 18, 2011

लोक-जनजाति कला अकादमी स्वतंत्र बने


मणिशंकर अय्यर की अध्यक्षता वाली उस समिति ने, जो क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों की समीक्षा के लिए बनी थी, अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। इस तीन सदस्यीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में एक दिलचस्प सुझाव दिया है जिसका न सिर्फ स्वागत किया जाना चाहिए बल्कि उसे तत्काल अमल में भी लाया जाना चाहिए। यह सुझाव है साहित्य अकादमी, ललित कला अकादमी और संगीत नाटक अकादमी की तर्ज पर एक नई लोक और जनजातीय कला अकादमी बनाने का। हालांकि ऐसा नहीं था कि अब तक लोक और जनजातीय कलाओं को केंद्रीय स्तर पर प्रोत्साहन और संरक्षण नहीं मिलता था। यह काम अब तक संगीत नाटक अकादमी के माध्यम से होता था। जाहिर है इस सिफारिश को अगर अमल में लाया जाता है तो संगीत नाटक अकादमी के दायरे से यह काम बाहर हो जाएगा। इससे अकादमी का भार भी हल्का होगा और वह शास्त्रीय कलाओं पर ज्यादा ध्यान देगी। हालांकि देखना यह है कि सरकार इस समिति की अनुशंसाओं पर ध्यान देती भी है या नहीं। इन्हीं क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों की समीक्षा के लिए पहले बनी अनंतमूर्ति समिति की रपट पांच साल तक धूल फांकती रही। पांच साल के बाद उसकी सिर्फ एक या दो अनुशंसाओं पर ही अमल हुआ। इस रूप में अय्यर समिति का परिणाम देखना बाकी है। बहरहाल, यह एक अलग मसला है। मुद्दे की बात यह है कि लोक और जनजातीय कलाओं के लिए नई अकादमी बनाने की अनुशंसाएं की गई हैं। यह अलग से रेखांकित करने की जरूरत नहीं कि यह जरूरी भी है। दरअसल, भारतीय कला परिदृश्य इतना वैविध्यपूर्ण है कि उसे संजोने और विकसित करने का काम किसी एक संस्थान के बूते की बात नहीं है। भारत में विविध शास्त्रीय कला परम्पराएं हैं लेकिन शास्त्रीय से भी ज्यादा लोक और जनजातीय कला परम्पराएं हैं। इनमें कई तो विलुप्त होने की कगार पर हैं। उन्हें न सिर्फ बचाया जाना चाहिए बल्कि उनका नवीनीकरण भी किया जाना चाहिए। इस सबके लिए पर्याप्त सुविधाएं और संसाधन चाहिए। इसके अलावा लोक कलाकारों के भीतर एक आत्मविश्वास पैदा करने की जरूरत भी है कि वे अपनी परम्परा और धरोहर को जीवित रखें। अगर नई अकादमी बनती है तो इस दिशा में कुछ उल्लेखनीय काम हो सकता है। लोक कलाकारों के आर्थिक पक्षों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए लेकिन मसला सिर्फ लोक और जनजातीय कलाओं के संरक्षण और संवर्धन का ही नहीं है। मसला तो लोककलाओं और शास्त्रीय कलाओं के बीच उस विभाजन तो रोकने का भी है जिसके कारण कलाओं की एक वर्ण व्यवस्था बन गई है और इसके तहत शास्त्रीय कही और मानी जानेवाली कलाएं उच्चतर मानी जाती हैं और लोक व आदिवासी कलाएं कुछ कमतर। यह दीगर बात है कि शास्त्रीय नृत्य और संगीत बेहद कठोर अभ्यास और अनुशासन से परिष्कृत होता है और उनमें निपुणता के लिए लम्बा वक्त और पूर्ण समर्पण चाहिए। इसके बरक्स यह माना जाता है कि लोक कलाकारों को उतने लम्बे अभ्यास की जरूरत नहीं होती लेकिन यही अपने में एक गलत अवधारणा है जिसके फैलने में उन सरकारी कार्यक्रमों की भी भूमिका है जो अक्सर किसी औपचारिक मौके पर अफरा-तफरी में कराए जाते हैं लेकिन हकीकत यह है कि बेहतर लोक कलाकार बनने के लिए भी जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसलिए नई समझ की भी आवश्यकता है। नई अकादमी, अगर बनती है तो उसके सामने यह चुनौती होगी कि लोक कलाकारों के प्रशिक्षण और नवीनीकरण के लिए काम करे। आजादी के बाद हमारी लोककलाएं सिर्फ प्रदर्शन की वस्तु बन गई। उन पर किसी तरह का बौद्धिक विमर्श नहीं हुआ। यानी नई अकादमी किसी तरह की अकादमिक जड़ता की शिकार न हो जाए जैसा कि कई राज्य अकादमियां हो चुकी हैं। नई अकादमी भारत में लोककलाओं और जनजातीय कलाओं में पुनर्जागरण पैदा कर सकती है लेकिन ऐसा करने के लिए उसे एक खुला और रचनात्मक दृष्टिकोण अपनाना होगा। बहरहाल पहले तो ये देखना है कि सरकार कितनी जल्दी इस दिशा में आगे बढ़ती है।


Sunday, April 10, 2011

बहियों में है देश के हर कोने का हिसाब


यदि आप अपना नाम बताएं और सामने बैठा पंडा-पुरोहित आपकी कई पीढि़यों के नाम बता दे तो आपको अचरज अवश्य होगा। जी हां, बद्रीनाथ धाम पहुंचने वाले श्रद्धालु चाहें तो अपने पुरखों की जानकारी पलक झपकते ही हासिल कर सकते हैं। दरअसल बद्रीनाथ के पंडे बहियों मे यहां आने वाले यात्रियों का रिकार्ड रखते आ रहे हैं और यह लेखा किसी अनमोल धरोहर से कम नहीं है। बद्रीनाथ में आने वाले तीर्थयात्रियों की पूजा-पाठ का दायित्व देवप्रयाग (टिहरी गढ़वाल) का पुरोहित समाज संभालता है। इनकी बहियों में राजा रजवाड़ों से लेकर स्वतंत्र भारत का इतिहास सिमटा हुआ है। सत्रहवीं शताब्दी से बहियों का प्रचलन सामने आया था। इससे पहले भोजपत्रों, ताम्रपत्रों का चलन था। देवप्रयाग नगर सहित 42 गांव के पुरोहितों की बहियों में भारत के चप्पे-चप्पे की जानकारी समाई हुई है। बदरीनाथ यात्रा पर आए तीर्थयात्रियों का नाम जाति, गोत्र, वंश, जिला, गांव, मोहल्ला सबकी जानकारी इनमें है। पुरोहितों के उपनाम भी उनके क्षेत्रानुसार यहां प्रचलन में है दिल्ली क्षेत्र का तीर्थ पुरोहित दिल्लीवाल, उसी तरह मेरठवाल, सागरवाल, प्रयागवाल, करोलीवाल, रीवांवाल आदि कहे जाते हैं। श्री बदरीपंडा पंचायत के तहत तीर्थ पुरोहितों के आठ थोकों की व्यवस्था बनी हुई है। पंडा पंचायत अध्यक्ष मुकेश भट्ट प्रयागवाल तीर्थ पुरोहितों की बहियों को महत्वपूर्ण सनद मानते हैं। उनके अनुसार देश के कई परिवारों का बंटवारों और फैसलों में कोर्ट भी इन्हें मान्य करता आया है। कई बहियां तो एक किलोमीटर लंबाई और 70 किलो वजन तक की भी हैं। पहले ये हरिद्वार से बद्रीनाथ लाई जाती थीं। बाद में इन बहियों को हरिद्वार, देवप्रयाग और बद्रीनाथ में रखा जाने लगा। काफी परिश्रम से बनी इन बहियों में भारत के प्रसिद्ध संतों राजनेताओं कलाकारों समाज सेवियों उद्योगपतियों आदि की वंशावलियां, उनके हस्ताक्षर सहित मौजूद हैं|

Saturday, March 12, 2011

रंग डाला तो करनी पड़ेगी शादी


 रंग डाला तो करनी पड़ेगी शादी। जी हां, कुछ ऐसी ही है झारखंड के पूर्वी सिंहभूम में बसे आदिवासी समुदाय की परंपरा। संथाल जाति (आदिवासी) में यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। यही कारण है कि होली के दौरान भी आदिवासी समुदाय रंगों से परहेज करता है। समुदाय में होली तो खेली जाती है लेकिन पानी से। अगर किसी युवक ने किसी युवती को रंग डाला तो माझी परगना (आदिवासी स्वशासन) व्यवस्था इसे गंभीर अपराध मानती है, क्योंकि रंग डालने को समुदाय में सिंदूरदान (विवाह की रस्म) के बराबर माना जाता है। रंग कोई भी हो, युवक ने युवती को अथवा युवती ने युवक को रंग डाला तो इसे जबरन विवाह माना जाता है, और एक बार रंग डालने के बाद इसे सामाजिक अपराध मानते हुए इस पर पंचों की बैठक बुलाई जाती है। अगर युवक-युवती शादी को तैयार हुए तो बाकी की रवायत मझी मोड़े (पंचों की राय) से पूरी कर दी जाती है, हालांकि अधिकांश समय रंग डालने वाले युवक पर डांडोंम (जुर्माना) ठोंक दिया जाता है। संथाल जाति की परंपराओं पर शोध कर रहे रांची विश्वविद्यालय के छात्र भुगलू सोरेन कहते हैं-आदिवासी समुदाय में महिलाओं को रंग डालना पूरी तरह मना है, लेकिन पुरानी परंपरा यह रही है कि जिस युवक-युवती में प्रेम होता है और उनके परिवार उनके विवाह की अनुमति नहीं देते वे अक्सर शादी करने के लिए यही रास्ता अपनाते हैं। लड़का या तो लड़की को जबरन सिंदूर डाल देता है, या फिर होली या किसी दूसरे अवसरों पर रंग डाल देता है। श्यामा प्रसाद मेमोरियल कॉलेज के ओलचिकि (संथाली लिपि के शिक्षक) लखाई बास्के बताते हैं कि किसी युवक ने अगर लड़की पर गलती से भी रंग डाला तो उसे आदिवासी परंपरा के मुताबिक विधिवत तलाक लेना पड़ता है। ऐसी घटनाओं में पहले पंच बैठते हैं, महिला की शिकायत सुनते हैं और जबरन रंग डालने की स्थिति में पहले तो युवक पर 2000 रुपए से 20 हजार रुपए तक का जुर्माना लगाते हैं, इसके बाद विधिवित तलाक की घोषणा करते हैं। तलाक तो हो जाता है लेकिन इस घटना के बाद उस युवती को छडूय यानी तलाकशुदा माना जाता है|

Monday, March 7, 2011

ठहरे हुए सांस्कृतिक केंद्र


राजीव गांधी के कार्यकाल में पूरे देश में सात क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों की स्थापना इस मकसद से की गई थी कि वे अपने-अपने इलाके की सांस्कृतिक विविधता और सृजनात्मकता के लिए माहौल बनाएंगे और उन्हें नए अवसर देंगें लेकिन जल्द ही ये संस्थाएं नौकरशाही के ढांचे में ऐसी ढलीं कि मकसद से ही भटक गई
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों (जोनल कल्चरल सेंटर) की समीक्षा के लिए मणिशंकर अय्यर की अध्यक्षता में जो तीन सदस्यीय समिति गठित की थी, उसकी रिपोर्ट अगले हफ्ते आ सकती है। अय्यर के अलावा भारत सरकार के पूर्व सांस्कृतिक सचिव सीताकांत महापात्र और अभिनेता- सह निर्देशक अमोल पालेकर इसके अन्य सदस्य हैं। ऐसे वक्त में जब देश की अन्य सांस्कृतिक संस्थाएं अपने मकसद से दूर होती गई हैं, तब सिर्फ क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों पर र्चचा करना शायद बहुत प्रासंगिक नहीं होगा। लेकिन चूंकि इनकी समीक्षा के लिए बनी समिति की रिपोर्ट आनेवाली है तो इस मसले पर चुप्पी एक सांस्कृतिक अनदेखी भी होगी। राजीव गांधी के कार्यकाल में पूरे देश में सात क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों की स्थापना इस मकसद से की गई थी कि वे अपने अपने इलाके की सांस्कृतिक विविधता और सृजनात्मकता के लिए माहौल बनाएंगें और उन्हें नए अवसर देंगें लेकिन जल्द ही ये संस्थाएं नौकरशाही के ढांचे में ऐसी ढलीं कि मकसद से ही भटक गई। ऐसा नहीं है कि ये निष्क्रिय रहीं। इनमें काफी सक्रियता रही और इनके आयोजनों में लोगों की भागादारी भी रहती है। लेकिन सिर्फ कार्यक्रमों का आयोजन ही काफी नहीं होता। वास्तविकता यह है कि सांस्कृतिक सृजनशीलता से जुड़े लोगों का इन सांस्कृतिक केंद्रों से तादात्म्य नहीं बन सका। ये क्षेत्रीय केंद्र मौटे तौर पर भारत सरकार के संगीत और नृत्य प्रभाग की तरह हो गए हैं जो यदा-कदा लोगों के लिए सिर्फ सांस्कृतिक शामें आयोजित करते हैं। इन केंद्रों का मुख्य जोर लोककला और लोकसंगीत पर रहा। पर वहां भी परिप्रेक्ष्य छोटा ही रहा। यह ठीक है कि भारत जैसे बड़े देश में लोककला- लोकसंगीत की अपनी अहिमयत है और वह धीरे-धीरे लगातार संकटग्रस्त होता जा रहा है किंतु लोककला कोई ठहरी हुई चीज नहीं है। वह भी निरंतर विकसित होनेवाली चीज है। भारत भवन में जगदीश स्वामीनाथन ने आदिवासी लोककलाओं को आधुनिकता के साथ जोड़ा था। इसी के फलस्वरूप जनगण सिंह श्याम और दूसरे कई आदिवासी कलाकारों ने आधुनिक चित्रकला में भी अपनी जगह बनाई। पर इन क्षेत्रीय केंद्रों ने आधुनिक चित्रकला और मूर्तिकला को पारंपरिक लोककलाओं के साथ जोड़ने की सघन कोशिश नहीं की। लोककलाएं भी नवीनता ग्रहण करती रहती हैं, इसका ध्यान नहीं रखा गया। भारत भवन का ही दूसरा उदाहरण लें तो बव कारंत ने बुंदेली में ब्रेख्त के नाटक किए जो अपने में काफी सफल प्रयोग था और आधुनिक भी। हमारे क्षेत्रीय केंद्र भी चाहते तो इस तरह के प्रयोग आधुनिक रंगकर्मिंयों के साथ मिलकर कर सकते थे। क्या यह जरूरी है कि जब भोजपुरी के कार्यक्रम हों तो वहां सिर्फ लोकगायन ही हो। फिर लोकभाषाओं में नई सृजनात्मकता कैसे पैदा होगी। हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ी में नाटक करने का जो सिलसिला शुरू किया, वह अपने में नई दिशा बन गई। हमारे क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र भी इस दिशा में आगे बढ़ते हुए नए अन्वेषण कर सकते थे। लेकिन इस दिशा में तो झांका भी नहीं गया। यह भी गौर करना जरूरी है कि जिस समय सांस्कृतिक केंद्रों की स्थापना हुई थी, उस समय फिल्म निर्माण की टेक्नोलॉजी काफी महंगी थी। लेकिन अब वो अपेक्षाकृत सस्ती हो गई है और सुलभ भी। हमारे सांस्कृतिक केंद्र इस दिशा में भी अपनी राहें बना सकते हैं। समीक्षा समिति में फिल्मकार अमोल पालेकर भी हैं। पता नहीं, उनका ध्यान इस तरफ जाता है या नहीं। लेकिन फिल्म को लेकर समाज की आकांक्षाओं को हमारे सांस्कृतिक केंद्र महसूस नहीं कर पाते। इसके अलावा बाल रंगमंच का सवाल है जिस पर हमारे सांस्कृतिक केंद्रों ने लगभग नहीं के बराबर ध्यान दिया है। पता नहीं समिति ने इसका खयाल रखा है या नहीं। बहरहाल, समिति की रिपोर्ट को लेकर समाज और सांस्कृतिक हलकों में व्यापक र्चचा होनी चाहिए। सातों सांस्कृतिक केंद्र ठहराव की स्थिति में हैं। उनकी सोच में बदलाव की जरूरत है।